Kanpur News: उत्तरप्रदेश का जिला कानपुर जिसे “मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट” और “लेदर सिटी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। उसका एक पक्ष इतना खतनाक है कि कानपुर में लोगों का रहना मुश्किल हो सकता है। कानपुर में क्रोमियम का बड़ा मामला सामने आया है। कानपुर के ड्योढ़ी घाट मोड़ से सलेमपुर तक, लगभग 20 किलोमीटर फैले क्षेत्र में, अत्यंत विषाक्त कचर फेंका जा रहा है। जिससे भविष्य में कई खटनाक बीमारियों के चपेट में लोग आ सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, (साढ़े 15 रुपए) करीब 16 रुपए बचाने के लिए, ये फैक्ट्रियां जहरीले कचरे को यूँही फेंक देती हैं।
Kanpur News: फैक्ट्री संचालकों की है गलती
19 जुलाई को पुरवामीर में क्रोमियम कचरा पाए जाने पर, इस बड़े विषैले कचड़े का खुलासा हुआ है। कानपुर में 20 किलोमीटर तक फैले इस कचड़ा, बारिश के समय में और घातक बन जाता है। बारिश के समय पर ये कचरा जलाशय में मिल जाता और उसे भी प्रदूषित कर रहा है। कानपुर में दो कंपनियां हैं जोज 12 से 18 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से क्रोमियम को निकलती हैं। फैक्ट्रियों से रोजाना कई टन क्रोमियम कचरा निकलता है जिससे, फैक्ट्री संचालकों पर बड़ा भार आ जाता है।
निस्तारण करने के बजाए 2.5 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से कचड़े को फेंकवाना सस्ता पड़ता है|
इन फैक्ट्री में इस्तेमाल होता है क्रोमियम
चमड़ा फैक्ट्री में जानवरों की खाल की ट्रेनिंग के लिए क्रोमियम का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे भारी मात्रा में जहरीला कचड़ा निकलता है। इलेक्ट्रोप्लाटिंग यूनिट्स में धातुओं पर चमक और जंग से सुरक्षा के लिए क्रोम का परत चढ़ाया जाता है। केमिकल फैक्ट्री में बेसिक क्रोम सल्फेट (बीसीएस) और रंग -पिगमेंट बनाने वाले कारखाने में क्रोमियम कचरा का इस्तेमाल होता है। क्रोमियम कचरा क्रोमियम के इस्तेमाल होने वाली फैक्ट्रियों से निकलता है।

यूपीपीसीबी नहीं कर रही जिम्मदारी का निर्वहन
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की जिम्मेदारी है की फैक्ट्री से निकलने वाली क्रोमियम कचड़ा और निस्तारण करने वाली कंपनियां में निस्तारित हो रहे क्रोमियम के लॉग बुक को जांच करें। पर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच बंद कर दिया है और इसलिए ये जहरीले कचड़े का ढेर लगा है।
कैंसर जैसे कई खतरनाक बीमारियों को जन्म देता है क्रोमियम
क्रोमियम के सीधे संपर्क में आने से त्वचा पर गंभीर जलन, रेस, एलर्जिक डर्मेटाइटिस और दर्दनाक क्रोम अल्सर हो जाते हैं।
शरीर में क्रोमियम की मात्रा बहुत बढ़ाने पर यकृत यानी लीवर और गुर्दे यानी किडनी की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है, जिससे उनके काम करने की क्षमता कम हो जाती है।
हेक्सावेलेंट क्रोमियम को ग्रुप -1 कार्सिनोजेन माना गया है, जो फेफड़ों की कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। इससे अस्थमा, त्वचा, अल्सर जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं।
क्रोमियम के धुएं या धूल में सांस लेने से नाक के टिशु खराब होना, साइनस, ब्रोकाइटिस, और व्यावसायिक अस्थमा जैसी दिखते भी होती हैं।
खून में क्रोमियम की मात्रा बढ़ने से ब्लड सेल्स की सामान्य काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। जिससे डीएनए डैमेज और रेड ब्लड सेल्स की टूटने जैसे प्रभाव देखे गए हैं, इससे एनीमिया, थकान और शरीर की ऑक्सीजन वहन की क्षमता कम हो सकती है।