ट्रंप का बड़ा फैसला: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक बेहद अहम समझौते को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है। इसके तहत सऊदी अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन कर पाएगा। इस बड़े फैसले ने कई सवाल उत्पन्न कर दिया है।
क्या पश्चिमी एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ जाएगा तनाव?
अमेरिका और ईरान के बीच इतने लंबे समय से तनाव और युद्ध की वजह यूरेनियम एनरिचमेंट (परमाणु संवर्धन) ही था। सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी(राइवल) रहे हैं। ऐसे में यूरेनियम एनरिचमेंट की मंजूरी पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन भी कर सकती है या तनाव भी बढ़ा सकती है।
ट्रंप का बड़ा फैसला क्या है?
अमेरिका ने सऊदी अरब को परमाणु संवर्धन को मंजूरी दे दी है। इसके तहत सऊदी अपने देश में नागरिक परमाणु कार्यक्रम के लिए यूरेनियम एनरिचमेंट कर सकेगा। इस समझौते की औपचारिक घोषणा जल्द ही करने वाला है, यह डील 30 वर्ष के लिए होने वाला है।

सऊदी अरब का क्या होगा फायदा?
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और ट्रंप दोनों ने ही सऊदी अरब के साथ अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयर करने की कोशिश की थी। अगर यूरेनियम एनरिचमेंट प्लांट सऊदी अरब में लग गए तो, परमाणु बम भी भविष्य में बनाया जा सकता है। यूरेनियम संवर्धन से यूरेनियम की शुद्धता बढाई जाती है यानि (यू -235) बढ़ाना। इसी प्रक्रिया से यूरेनियम परमाणु बिजली बनती है और बहुत ज्यादा संवर्धित करने पर परमाणु बम भी बनाया जा सकता है।
सऊदी में यूरेनियम संवर्धन प्लांट से बिजली का उत्पादन अधिक होगा, क्षेत्रीय संतुलन भी (ईरान के साथ) बना रहेगा तथा भविष्य में परमाणु बम भी तैयार किया जा सकेगा।
पश्चिमी एशिया में क्यों बढ़ी तनाव ?

सऊदी अरब को यह मंजूरी बिना किसी जरूरी सुरक्षा शर्तों के मिली है, जिससे खड़ी की बाकी देशों की चिंता बढ़ सकती है। ट्रूप का यह फैसला सिर्फ ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसा माना जा रहा है कि ये ट्रंप की ईरान के खिलाफ बड़ी रणनीति है। सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले भी कह चुके थे कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो सऊदी भी उसी दिशा में कदम उठा सकता है।
ट्रंप का बड़ा फैसला: इससे भारत पर क्या होगा असर
सऊदी अरब भारत को तेल और ऊर्जा आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में से एक है। 30 वर्ष वाले इस डील के कारण अरब में परमाणु ढांचा विकसित होगा, जिससे वैश्विक स्तर पर स्थिरता बढ़ेगी और भारत को तेल और ऊर्जा आपूर्ति में सुविधा होगी। वहीं, ईरान और सऊदी अरब में क्षेत्रीय राइवलरी बढ़ सकती है जिससे भारत के लाखों प्रवासी श्रमिकों को समस्या हो सकती है।